सोने की सेल -aa21

posted Oct 29, 2014, 12:17 PM by A Billion Stories
सोने की सेल
राजस्थान के एक गांव में रामलाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके दो बेटे थे - चंदन और मधुर। दोनों का जैसा नाम था, वैसे लक्षण तो बिल्कुल भी नहीं थे। यूं चंदन का मतलब शीतलता होता है, परंतु वो चंदन इससे बिल्कुल विपरीत था। और मधुर, उसकी तो मानो बोली ही इतनी कड़वी थी कि मधुर नाम भी स्वयं पर शर्मा जाता था। दोनों बहुत लड़ाके थे। कभी कोई गलती हो जाने पर दोनों में से कोई भी अपनी गलती नहीं मानता और हर गल्त बात का इल्ज़ाम दूसरे पर लगा देता।

रामलाल अपने दोनों बेटों की इन करतूतों से बहुत दुखी था। वह पूरे गांव में अपनी समझदारी और अच्छे व्यवहार के लिये प्रसिद्ध था। सब उसकी दरियादिली की प्रशंसा करते न थकते थे। परंतु अब जैसे-जैसे उसके दोनों बेटे बड़े होते जा रहे थे, उनके दुष्ट आचार के कारण लोग अब रामलाल से भी दूरी बनाकर रखने लगे थे।

एक दिन रामलाल बहुत उदास बैठे था। उसका एक पड़ोसी और बहुत ही प्रिय मित्र था, कन्हैया लाल। वह अक्सर अपने मित्र का दर्द बांटने आता रहता था। रामलाल को काफी दिनों से उदास देखकर कन्हैया लाल ने अपने मित्र से उसकी परेशानी बांटी। "क्यों भाई रामलाल, क्या हाल है? बहुत उदास बैठे हो। सब ठीक तो है ना?" कन्हैया लाल ने पूछा तो मानो जैसे रामलाल को अपने दिल की सारी भड़ास निकालने का मौका मिल गया।

"अरे क्या बताऊँ भाई। नाक में दम कर दिया इन नालायकों ने। एक तो काम-धाम कुछ करते नहीं दोनों! उपर से एक सेर है, तो दूसरा सवा सेर! क्या करूं इन लड़कों का! अब तो नौबत ये आ गयी है कि पूरा गांव मूझसे भी कतराता है। कितना समझा लिया, पर कोई फायदा नहीं। पता नहीं भाग्यवान को भी क्या जल्दी थी नर्क सिधारने की। इन दो आफतों को मेरे गले बांधकर इतने सालों से नर्क के मज़े ले रही है महारानी। अब तुम ही कोई उपाय दे सकते हो तो दो। मैं तो हार गया!"

"पर तुम्हें कैसे पता कि भाभीजी नर्क ही गयी होंगी?"

"अब सीधी सी बात है मित्र, ऐसी औलादों को जन्म देकर स्वर्ग के द्वार तो उन्होने खुद ही अपने लिये बंद कर दिये।" कहकर रामलाल और कन्हैया लाल दोनों ठहाके मारकर हंसने लगे।

इन्ही हंसी-ठिठोलों के बीच अचानक कन्हैया लाल ने रामलाल से कहा, "खैर, अब तो मेरे खय़ाल में तुम्हारे बेटों को सीधा करने का एक ही तरीका है - शादी!"

कन्हैया लाल ने जब अपना सुझाव दिया तो रामलाल के कान गुस्से से लाल हो उठे! "देखो भाई, ढंग कि सलाह देनी है तो दो! अब इस उमर में विवाह करके जो बची-कूची नाक है, उसे भी कटवा दूं क्या! और फिर, ये दो क्या काम हैं, जो तीसरी आफत को भी सर पर बैठना चाहते हो मेरे! "

"अरे भाई! नाराज़ क्यों होते हो! पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो। मैं तुम्हारी नहीं, तुम्हारे बेटों, चंदन और मधुर के विवाह क़ी बात कर रहा हूँ, अब २१ साल के तो हो ही गये हैं दोनों, बस ले आओ दो अच्छी कन्याएँ, अब वे ही इनकी अक्ल को ठिकाने लगा पायेंगी!"

जब कन्हैया लाल ने अपनी बात को ढंग से समझाया तो उसकी बात रामलाल को जंच गयी! " बात तो ठीक है तुम्हारी! विवाह हो जायेगा तो अपनी ज़ीम्मेदारियों में व्यस्त हो जायेंगे। तभी शायद जीवन के मोल को समझ पायेंगे ये लड़के। ठीक है, कल ही दोनों के लिये रिश्ते ढूंढने का काम शुरू करता हूँ।"

कुछ ही दिनों के बाद रामलाल को अपने दोनों बेटों के लिये एक ही घराने क़ी दो बेटियों का रिश्ता मिल गया। घर अच्छा था और रिश्ता भी बराबरी का था। रामलाल अपने इस कार्य से बहुत संतुष्ट हुआ। वह जल्द ही अपनी बहुओं को घर लाना चाहता था, इसलिये देखते ही देखते बस कुछ ही दिनों में दोनों का लग्न सम्पन्न हो गया।
मगर वो कहावत है न, गये थे रोज़ा छुडाने, गले पड़ी नमाज़! बस, वही हाल बेचारे रामलाल जी का भी हुआ। बहुओं को लाये थे यह सोचकर कि बेटे सुधर जायेंगे, मगर यहाँ तो बहुएँ बेटों से भी बड़कर निकलीं। कहने को तो दोनों सगी बहनें थी, मगर दोनों लडने में चंदन और मधुर से भी दस कदम आगे थी।


बेचारे रामलाल के पास अब कोई चारा न था। अब तो मानो इधर कुआँ उधर खाई वाली हालत थी। बेटे तो पहले ही ऐसे थे, उपर से बहुएं भी सुधरने वालों में से नहीं थी। बेचारे बेसहारा होकर फिर से पहुंच गये अपने मित्र के पास।
"ये तो हद्द ही हो गयी। अब तुम ही बताओ की क्या करूं। तुमने ही मुझे इस उलझन में फंसाया है। सुधारने के चक्कर में मेरे तो बेटे भी हाथ से निकल गये। "

"अरे घबराते क्यों हो रामलाल? तुम इतने समझदार हो, सारा गांव तुम्हारा लोहा मानता है। और तुम हो, कि अपने ही समय में घबरा गये। अब तो तुम्हारे पास बल्कि अच्छा मौका है, बेटों को अकेले सुधार पाना मुश्किल था, अब बहुओं के सहारे उनका भी बेड़ा पार लगाया जा सकता है। "

दो बहुएँ, दो बेटे! मतलब कि कुल मिलाकर चार-चार आफतें! बेचारे रामलाल! अब तो दो की बजाय चार की ज़िम्मेवारी आन पढ़ी थी! अब तो इकलौते मित्र ने भी उन्ही पर ये भार छोड़ दिया था! क्या करें! कहाँ जायें! सोचते-सोचते दिन निकल गया और अपनी रफ़्तार से बढ़ता चला गया। अगले दिन:

"अरे बाबूजी, आज क्या अखबार नहीं पढोगे? ये लो, आज का अखबार।" अखबार वाला चिल्लाते हुये आया.

"अरे दे बेटा, एक ये अखबार ही तो सहारा बचा है अब जीवन सुख से बीताने का। बाकि के सुख-चैन तो ना जाने, कब नसीब होंगे! या ना जाने, कभी होंगे भी या नहीं!" निराशा भरे ये स्वर, अपने जीवन के चार अनमोल रत्नों को सुनाने के प्रयत्न में रामलाल ने अखबार वाले से अखबार लिया, और पढना शुरू कर दिया। पढते पढते अचानक अखबार में से एक पर्ची निकल गयी और उढ़ती-उढ़ती घर के मुख्य द्वार पर जा पहुंची। मधुर घर से बाहर निकल रहा था कि अचानक उसकी नज़र अखबार में से निकली उस पर्ची पर पढी.

"सोने की सेल! अरे वाह। ये तो बड़े काम की पर्ची लगती है। " वह पर्ची को हाथ में उठाकर पढते हुये खुद से बड़बड़ाने लगा।


"अरे क्या है, मुझे दिखा तो।" जब रामलाल ने पर्ची देखने के लिये मांगी तो मधुर ने बात को टालते हुये कहा, "कुछ नहीं बाबूजी, कचरा पड़ा था रास्ते में, फेंककर आता हूँ."

अब इतना तो रामलाल को भी मलूम था कि उसका बेटा इतना सपूत नहीं कि रास्ते में पड़े कचरे को उठाकर फेंकने का कष्ट करे। 'खैर, जाने दो! इस नालायक की बातों पर अपना समय कौन बर्बाद करे। अखबार की सुर्खियों पर ही ध्यान ठीक है!' सोचकर वे अपने अखबार में पुन: व्यस्त हो गए।


"सोने की सेल! दिनांक १० मई, रविवार, गांव के खुुले मैदान में। अरे वाह, बाबूजी के उस बेकार से अखबार में से कोई काम की चीज़ भी निकल सकती है! अरे कमला, सुनती हो, देखो क्या लिखा है, अगले रविवार को दोपहर दो बजे सोने की सेल लगने वाली है, गांव के खुले मैदान में। "

कमला, यानी मधुर की पत्नी अपने पति परमेश्वर की आवाज़ को यूं तो सुना-अनसुना कर देती थी, परन्तु आज तो पतिदेव ने सोने का नाम लिया था, तो भला हमारी कमला कैसे नहीं सुनती उनकी बात। सो, एक ही आवाज़ पर दौडी चली आयी।

"क्या, सोने की सेल! कहाँ! हमारे गांव में! सच? "

"अरे हाँ। और वो भी रविवार को, यानि तीन दिन बाद। "

"अजी मैं क्या कहती हूँ, हम भी चलेंगे इस सेल में। कितने दिन हो गए हमारी शादी को, मगर आपने आज तक मूझे कभी कुछ नहीं दिलाया, कम से कम सेल में घुमाकर ही ले आओ! "

"अरे तुम चिन्ता क्यों करती हो! मैं क्या बेवकूफ हूँ, अगर तुझे ले जाना न होता, तो मैं बताता ही क्यों! तैयार रहना। और सुन, किसी से कहना मत। किसी से मतलब..."

"अजी मैं समझ गयी, तुम्हारे बाबूजी, भइया और भाभी, हैना। "

"हाँ रे, तू तो बड़ी समझदार है। "



मगर अफसोस! चन्दन की पत्नी, और कमला की बहन, यानि, निर्मला ने उन दोनों की सब बातें सुन ली और जाकर अपने पति को सेल की खबर दे दी.

"अच्छा! तो अब ये दोनों पति-पत्नी सेल में जायेंगे! और हम, हम क्या बैठे रहेंगे घर पर! निर्मला, तुम भी तैयारी करके रखना, हम भी सोने की सेल में चलेंगे, और इन दोनों से अधिक खरीददारी कर के लायेंगे। और सुनो, तुम भी किसी से कुछ न कहना!"


मगर कमला और निर्मला थी तो आखिर बहनें! दोनों के पेट में बात पचने कहाँ वाली थी! एक से दो, दो से तीन, और फिर दिन भर में बात पूरे गांव में फै़ल गयी कि गांव के खुले मैदान में सोने की सेल लगने वाली है। गांव के सभी मूर्खों ने अपनी जमापूंजी बेच डाली। कारण, यही कि सेल में अधिक सोना कम भाव में खरीद कर मुनाफा कमायेंगे। उन मूर्खों में रामलाल जी के दोनों बेटे और बहुएँ तो अव्वल नंबर पर थे। आखिर पूरे गांव में ये चर्चा फैलाने वाले भी तो वही थे।

अगले दिन का सूरज उगते ही दोपहर दो बजे, गांव के खुले मैदान में, गांव के सभी मूर्खों का एक अनोखा मेला लगने वाला था, जिसका नाम था, 'सोने की सेल'!

अगला दिन आया। सारे गांव में हलचल सी मची हुई थी। जिन्हे कारण पता था, वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, और जिन्हे इस हलचल की कोई खबर न थी, उनको इसी बात की चिन्ता सताये जा रही थी कि आखिर इन सब को हो क्या गया है! रामलाल जी भी इसी बात से परेशान थे कि आखिर उनके दोनों बेटे और बहुएँ अब कौन सा धमाल करने वाले हैं। उन्हे इस बात का अनुमान था कि दोनों ने अपनी सारी जमापूंजी, जो असल में उनकी ही थी, निकाल रखी है, परन्तु किस काम के लिये, ये जानना बहुत मुश्किल किन्तु आवश्यक था। अखिरकार सेल का समय आ ही गया और लग गया मूर्खों का एक विचित्र मेला।

सोने की सेल! सोच-सोचकर ही मन में लड्डू फूटे जा रहे थे। मगर ये क्या! मैदान में तो ना सोने के गहने थे, ना उनकी चमक! वहां पर तो एक नाटक चल रहा था। और नाटक के मंच के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, 'सोने की सेल'!

तो बात सीधी थी! जो सोने की सेल होने वाली थी, वो तो दरअसल एक नाटक था, जिसे रामलाल के मूर्ख बेटे-बहुओं ने असली सेल समझकर इसकी खबर को आग की तरह फैला दिया।

अब मरते क्या ना करते! बैठ गए वहीं सब सेल का तमाशा देखने के लिये। नाटक शुरू होते ही पूरे मैदान में सन्नाटा हो गया। सभी तमाशे में लीन हो गए।

जब नाटक खत्म हुआ तो सबने चंदन और मधुर से सवाल शुरू कर दिये! मगर उन्होने बात को गांववालों पर ही डालते हुए कहा कि पर्ची सिर्फ उनके घर नहीं, बल्कि पूरे गांव में बंटी होगी। तो सबकी गलती ये थी कि किसी ने अपना दिमाग न लगाते हुए उनकी बात पर भरोसा क्यों किया! खैर, सब जानते थे कि इन दोनों के साथ बहस करना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना है! जाने दो! सब घर जाने लगे तो पता चला कि वह लोग जो सेल के भुलावे से खर्चने के लिये पैसा लेकर आये थे, सारा का सारा चोरी हो गया था। पूरे मैदान में खलबली मच गयी। सबने अपने इस नुक्सान का ज़िम्मेवार मधुर और चन्दन को बताते हुए उन्हें पीटना शुरू कर दिया। इतने में वहाँ पर पुलिस आ गयी, "ये सब क्या हो रहा है?"

गांववालों ने सारी बात हवलदार को बता दी।


"ह्म! तो ये है सारा खेल। अब तो इन दोनों को पकड़ना ही पड़ेगा। चलो थाने!"

"मगर हवलदार साहब, मैने कुछ नहीं किया! सेल की झूठी खबर तो इस मधुर ने फैलाई थी और सब बेवकूफ बन गए। "

चंदन ने अपनी सफाई देने की कोशिश की तो मधुर भला कैसे पीछे रहता!
"नहीं हवलदार साहब, मैने कुछ नहीं किया, मैं तो बस अपनी घरवाली से बात कर रहा था और इसने मेरी बात सुनकर पूरे गांव में ये हल्ला मचा दिया कि गांव में सेल लगने वाली है। अब आप ही बताईये, अपनी घरवाली से बात करना भी कोई अपराध है क्या!"

"मधुर, झूठ मत बोल! तूने भी तो सबको इस झांसे में फंसाया था की गांव में सेल लगने वाली है।"

"...अरे!!! बस करो अब! मेरा सर फटा जा रहा है तुम दोनों की बहस से! चलो, तुम दोनों को ही जेल में बंद कर देता हूँ!"

हवलदार घसीटता हुआ दोनों भाइयों को थाने ले गया और जेल में डाल दिया। दोनों की पत्नियाँ रोते रोते अपने ससुर के पास गयीं और उन्हे सारी बात बता दी।

रामलाल को अपने बेटों की इस करतूत पर बहुत गुस्सा आया। मगर घर कि इज़्ज़त बचाने के लिये उन्हे जेल से छुड़वाना आवश्यक था। उन्हे छुड़वाने के लिये पुलिस स्टेशन पहुंचा। थाने पहुंचकर वहां का नज़ारा देखकर वह दंग रह गया। चंदन और मधुर, जो एक दूसरे की बात को सदैव काटते थे, इस समय एक दूसरे के गले लगकर ज़ोर ज़ोर से रो रहे थे। रामलाल को यह सब बहुत अच्छा लगा। उन्हे ऐसा अनोखा दृश्य अपने जीवन काल में पहली बार देखने को मिला था।

उनकी आँखें खुशी से भर आईं। उन्होने जाकर हवलदार से अपने बेटों की इस करतूत के लिये माफी मांगी और उन्हें ज़मानत पर छोड़ देने की बिनती की।

हवलदार ने चुपचाप जाकर जेल का द्वार खोल दिया, चंदन और मधुर दोनों बाहर आये और अपने पिता से माफी मांगते हुये फूट-फूट कर रोने लगे। परंतु रामलाल ने अपने हृदय को थोड़ा कठोर बनाते हुये दोनों से कहा, "भले ही कानून ने तुम्हे माफी दे दी हो, मगर मेरे लिये तुम आज भी वही नकारा-निकम्मे कपूत हो जिन्होने गांव भर में मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी है। मैं तुम्हें केवल एक ही शर्त पर माफ कर सकता हूँ।"

"क्या बाबूजी??" दोनों ने एक ही स्वर में पूछा।
"यही कि तुम दोनों को मिलकर सारे गांव का हर्ज़ाना चुकाना होगा। और वो भी अपनी कमाई से। भले ही इसके लिये तुम्हे अपना बाकि का सारा जीवन मेहनत करनी पड़े, मगर जब तक ऐसा नहीं होगा, मेरे घर में तुम दोनों के लिये कोई जगह नहीं होगी।

"नहीं बाबूजी, ऐसा मत कहिये आप! हम आपसे वादा करते हैं की हमारे कारण जो आपको कष्ट हुआ है, उसका हर्ज़ाना हम ज़रूर भरेंगे। "

रामलाल अपने बेटों को इसी शर्त पर घर ले आया। दोनों बेटों में मिट्टी के खिलौने बनाने की अद्भुत कला थी। सो, दोनों ने मिलकर अपनी इस कला को अपना काम बना लिया और इसी ज़रिये दोनों मिलकर खूब पैसे कमाने लगे।


दो वर्ष बीत गये। चंदन और मधुर ने खूब पैसा कमा लिया था। और अब, चारों मिल-जुलकर रहने लगे थे। रामलाल के कहने पर दोनों ने सारा पैसा बेंक में जमा करना शुरू कर दिया और हर्ज़ाने को चुकाने के लिये पैसा इकट्‌ठा करने लगे। पुलिस कि मदद से उन्होने उन बदमाशों को भी पकडवा लिया था जिन्होने नाटक के दौरान सबके पैसे चोरी किये थे। उन्हे सज़ा तो दिलवा दी गयी परंतु वो चोरी के पैसे उनके पास नहीं मिले।

कुछ दिनों के बाद उन चारों को रामलाल ने जब असली कहानी बताई, तो वे अपनी ही मूर्खता और भूल पर हंस पड़े। दरअसल, यह सारा खेल रामलाल का रचाया हुआ था। सोने की इस सेल की कहानी के रचनाकार वही थे, जिन्होने सारे गांववालों, नाटक वालों, पुलिस और नकली चोरों की मदद से अपने दोनों बेटों और बहुओं को सीधा करने की योजना बनाई और इस कार्य में सफल होकर दिखाया।


-aa21

Photo by:
Submitted by: aa21
Submitted on: Mon Sep 29 2014 15:39:02 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


- Read submissions at http://abillionstories.wordpress.com
- Submit a poem, quote, proverb, story, mantra, folklore, article, painting, cartoon, drawing, article in your own language at http://www.abillionstories.com/submit

Comments