Hindi Stories

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    Posted Oct 29, 2014, 12:17 PM by A Billion Stories
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    Posted Jan 29, 2014, 11:17 AM by A Billion Stories
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सोने की सेल -aa21

posted Oct 29, 2014, 12:17 PM by A Billion Stories

सोने की सेल
राजस्थान के एक गांव में रामलाल नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके दो बेटे थे - चंदन और मधुर। दोनों का जैसा नाम था, वैसे लक्षण तो बिल्कुल भी नहीं थे। यूं चंदन का मतलब शीतलता होता है, परंतु वो चंदन इससे बिल्कुल विपरीत था। और मधुर, उसकी तो मानो बोली ही इतनी कड़वी थी कि मधुर नाम भी स्वयं पर शर्मा जाता था। दोनों बहुत लड़ाके थे। कभी कोई गलती हो जाने पर दोनों में से कोई भी अपनी गलती नहीं मानता और हर गल्त बात का इल्ज़ाम दूसरे पर लगा देता।

रामलाल अपने दोनों बेटों की इन करतूतों से बहुत दुखी था। वह पूरे गांव में अपनी समझदारी और अच्छे व्यवहार के लिये प्रसिद्ध था। सब उसकी दरियादिली की प्रशंसा करते न थकते थे। परंतु अब जैसे-जैसे उसके दोनों बेटे बड़े होते जा रहे थे, उनके दुष्ट आचार के कारण लोग अब रामलाल से भी दूरी बनाकर रखने लगे थे।

एक दिन रामलाल बहुत उदास बैठे था। उसका एक पड़ोसी और बहुत ही प्रिय मित्र था, कन्हैया लाल। वह अक्सर अपने मित्र का दर्द बांटने आता रहता था। रामलाल को काफी दिनों से उदास देखकर कन्हैया लाल ने अपने मित्र से उसकी परेशानी बांटी। "क्यों भाई रामलाल, क्या हाल है? बहुत उदास बैठे हो। सब ठीक तो है ना?" कन्हैया लाल ने पूछा तो मानो जैसे रामलाल को अपने दिल की सारी भड़ास निकालने का मौका मिल गया।

"अरे क्या बताऊँ भाई। नाक में दम कर दिया इन नालायकों ने। एक तो काम-धाम कुछ करते नहीं दोनों! उपर से एक सेर है, तो दूसरा सवा सेर! क्या करूं इन लड़कों का! अब तो नौबत ये आ गयी है कि पूरा गांव मूझसे भी कतराता है। कितना समझा लिया, पर कोई फायदा नहीं। पता नहीं भाग्यवान को भी क्या जल्दी थी नर्क सिधारने की। इन दो आफतों को मेरे गले बांधकर इतने सालों से नर्क के मज़े ले रही है महारानी। अब तुम ही कोई उपाय दे सकते हो तो दो। मैं तो हार गया!"

"पर तुम्हें कैसे पता कि भाभीजी नर्क ही गयी होंगी?"

"अब सीधी सी बात है मित्र, ऐसी औलादों को जन्म देकर स्वर्ग के द्वार तो उन्होने खुद ही अपने लिये बंद कर दिये।" कहकर रामलाल और कन्हैया लाल दोनों ठहाके मारकर हंसने लगे।

इन्ही हंसी-ठिठोलों के बीच अचानक कन्हैया लाल ने रामलाल से कहा, "खैर, अब तो मेरे खय़ाल में तुम्हारे बेटों को सीधा करने का एक ही तरीका है - शादी!"

कन्हैया लाल ने जब अपना सुझाव दिया तो रामलाल के कान गुस्से से लाल हो उठे! "देखो भाई, ढंग कि सलाह देनी है तो दो! अब इस उमर में विवाह करके जो बची-कूची नाक है, उसे भी कटवा दूं क्या! और फिर, ये दो क्या काम हैं, जो तीसरी आफत को भी सर पर बैठना चाहते हो मेरे! "

"अरे भाई! नाराज़ क्यों होते हो! पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो। मैं तुम्हारी नहीं, तुम्हारे बेटों, चंदन और मधुर के विवाह क़ी बात कर रहा हूँ, अब २१ साल के तो हो ही गये हैं दोनों, बस ले आओ दो अच्छी कन्याएँ, अब वे ही इनकी अक्ल को ठिकाने लगा पायेंगी!"

जब कन्हैया लाल ने अपनी बात को ढंग से समझाया तो उसकी बात रामलाल को जंच गयी! " बात तो ठीक है तुम्हारी! विवाह हो जायेगा तो अपनी ज़ीम्मेदारियों में व्यस्त हो जायेंगे। तभी शायद जीवन के मोल को समझ पायेंगे ये लड़के। ठीक है, कल ही दोनों के लिये रिश्ते ढूंढने का काम शुरू करता हूँ।"

कुछ ही दिनों के बाद रामलाल को अपने दोनों बेटों के लिये एक ही घराने क़ी दो बेटियों का रिश्ता मिल गया। घर अच्छा था और रिश्ता भी बराबरी का था। रामलाल अपने इस कार्य से बहुत संतुष्ट हुआ। वह जल्द ही अपनी बहुओं को घर लाना चाहता था, इसलिये देखते ही देखते बस कुछ ही दिनों में दोनों का लग्न सम्पन्न हो गया।
मगर वो कहावत है न, गये थे रोज़ा छुडाने, गले पड़ी नमाज़! बस, वही हाल बेचारे रामलाल जी का भी हुआ। बहुओं को लाये थे यह सोचकर कि बेटे सुधर जायेंगे, मगर यहाँ तो बहुएँ बेटों से भी बड़कर निकलीं। कहने को तो दोनों सगी बहनें थी, मगर दोनों लडने में चंदन और मधुर से भी दस कदम आगे थी।


बेचारे रामलाल के पास अब कोई चारा न था। अब तो मानो इधर कुआँ उधर खाई वाली हालत थी। बेटे तो पहले ही ऐसे थे, उपर से बहुएं भी सुधरने वालों में से नहीं थी। बेचारे बेसहारा होकर फिर से पहुंच गये अपने मित्र के पास।
"ये तो हद्द ही हो गयी। अब तुम ही बताओ की क्या करूं। तुमने ही मुझे इस उलझन में फंसाया है। सुधारने के चक्कर में मेरे तो बेटे भी हाथ से निकल गये। "

"अरे घबराते क्यों हो रामलाल? तुम इतने समझदार हो, सारा गांव तुम्हारा लोहा मानता है। और तुम हो, कि अपने ही समय में घबरा गये। अब तो तुम्हारे पास बल्कि अच्छा मौका है, बेटों को अकेले सुधार पाना मुश्किल था, अब बहुओं के सहारे उनका भी बेड़ा पार लगाया जा सकता है। "

दो बहुएँ, दो बेटे! मतलब कि कुल मिलाकर चार-चार आफतें! बेचारे रामलाल! अब तो दो की बजाय चार की ज़िम्मेवारी आन पढ़ी थी! अब तो इकलौते मित्र ने भी उन्ही पर ये भार छोड़ दिया था! क्या करें! कहाँ जायें! सोचते-सोचते दिन निकल गया और अपनी रफ़्तार से बढ़ता चला गया। अगले दिन:

"अरे बाबूजी, आज क्या अखबार नहीं पढोगे? ये लो, आज का अखबार।" अखबार वाला चिल्लाते हुये आया.

"अरे दे बेटा, एक ये अखबार ही तो सहारा बचा है अब जीवन सुख से बीताने का। बाकि के सुख-चैन तो ना जाने, कब नसीब होंगे! या ना जाने, कभी होंगे भी या नहीं!" निराशा भरे ये स्वर, अपने जीवन के चार अनमोल रत्नों को सुनाने के प्रयत्न में रामलाल ने अखबार वाले से अखबार लिया, और पढना शुरू कर दिया। पढते पढते अचानक अखबार में से एक पर्ची निकल गयी और उढ़ती-उढ़ती घर के मुख्य द्वार पर जा पहुंची। मधुर घर से बाहर निकल रहा था कि अचानक उसकी नज़र अखबार में से निकली उस पर्ची पर पढी.

"सोने की सेल! अरे वाह। ये तो बड़े काम की पर्ची लगती है। " वह पर्ची को हाथ में उठाकर पढते हुये खुद से बड़बड़ाने लगा।


"अरे क्या है, मुझे दिखा तो।" जब रामलाल ने पर्ची देखने के लिये मांगी तो मधुर ने बात को टालते हुये कहा, "कुछ नहीं बाबूजी, कचरा पड़ा था रास्ते में, फेंककर आता हूँ."

अब इतना तो रामलाल को भी मलूम था कि उसका बेटा इतना सपूत नहीं कि रास्ते में पड़े कचरे को उठाकर फेंकने का कष्ट करे। 'खैर, जाने दो! इस नालायक की बातों पर अपना समय कौन बर्बाद करे। अखबार की सुर्खियों पर ही ध्यान ठीक है!' सोचकर वे अपने अखबार में पुन: व्यस्त हो गए।


"सोने की सेल! दिनांक १० मई, रविवार, गांव के खुुले मैदान में। अरे वाह, बाबूजी के उस बेकार से अखबार में से कोई काम की चीज़ भी निकल सकती है! अरे कमला, सुनती हो, देखो क्या लिखा है, अगले रविवार को दोपहर दो बजे सोने की सेल लगने वाली है, गांव के खुले मैदान में। "

कमला, यानी मधुर की पत्नी अपने पति परमेश्वर की आवाज़ को यूं तो सुना-अनसुना कर देती थी, परन्तु आज तो पतिदेव ने सोने का नाम लिया था, तो भला हमारी कमला कैसे नहीं सुनती उनकी बात। सो, एक ही आवाज़ पर दौडी चली आयी।

"क्या, सोने की सेल! कहाँ! हमारे गांव में! सच? "

"अरे हाँ। और वो भी रविवार को, यानि तीन दिन बाद। "

"अजी मैं क्या कहती हूँ, हम भी चलेंगे इस सेल में। कितने दिन हो गए हमारी शादी को, मगर आपने आज तक मूझे कभी कुछ नहीं दिलाया, कम से कम सेल में घुमाकर ही ले आओ! "

"अरे तुम चिन्ता क्यों करती हो! मैं क्या बेवकूफ हूँ, अगर तुझे ले जाना न होता, तो मैं बताता ही क्यों! तैयार रहना। और सुन, किसी से कहना मत। किसी से मतलब..."

"अजी मैं समझ गयी, तुम्हारे बाबूजी, भइया और भाभी, हैना। "

"हाँ रे, तू तो बड़ी समझदार है। "



मगर अफसोस! चन्दन की पत्नी, और कमला की बहन, यानि, निर्मला ने उन दोनों की सब बातें सुन ली और जाकर अपने पति को सेल की खबर दे दी.

"अच्छा! तो अब ये दोनों पति-पत्नी सेल में जायेंगे! और हम, हम क्या बैठे रहेंगे घर पर! निर्मला, तुम भी तैयारी करके रखना, हम भी सोने की सेल में चलेंगे, और इन दोनों से अधिक खरीददारी कर के लायेंगे। और सुनो, तुम भी किसी से कुछ न कहना!"


मगर कमला और निर्मला थी तो आखिर बहनें! दोनों के पेट में बात पचने कहाँ वाली थी! एक से दो, दो से तीन, और फिर दिन भर में बात पूरे गांव में फै़ल गयी कि गांव के खुले मैदान में सोने की सेल लगने वाली है। गांव के सभी मूर्खों ने अपनी जमापूंजी बेच डाली। कारण, यही कि सेल में अधिक सोना कम भाव में खरीद कर मुनाफा कमायेंगे। उन मूर्खों में रामलाल जी के दोनों बेटे और बहुएँ तो अव्वल नंबर पर थे। आखिर पूरे गांव में ये चर्चा फैलाने वाले भी तो वही थे।

अगले दिन का सूरज उगते ही दोपहर दो बजे, गांव के खुले मैदान में, गांव के सभी मूर्खों का एक अनोखा मेला लगने वाला था, जिसका नाम था, 'सोने की सेल'!

अगला दिन आया। सारे गांव में हलचल सी मची हुई थी। जिन्हे कारण पता था, वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, और जिन्हे इस हलचल की कोई खबर न थी, उनको इसी बात की चिन्ता सताये जा रही थी कि आखिर इन सब को हो क्या गया है! रामलाल जी भी इसी बात से परेशान थे कि आखिर उनके दोनों बेटे और बहुएँ अब कौन सा धमाल करने वाले हैं। उन्हे इस बात का अनुमान था कि दोनों ने अपनी सारी जमापूंजी, जो असल में उनकी ही थी, निकाल रखी है, परन्तु किस काम के लिये, ये जानना बहुत मुश्किल किन्तु आवश्यक था। अखिरकार सेल का समय आ ही गया और लग गया मूर्खों का एक विचित्र मेला।

सोने की सेल! सोच-सोचकर ही मन में लड्डू फूटे जा रहे थे। मगर ये क्या! मैदान में तो ना सोने के गहने थे, ना उनकी चमक! वहां पर तो एक नाटक चल रहा था। और नाटक के मंच के पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, 'सोने की सेल'!

तो बात सीधी थी! जो सोने की सेल होने वाली थी, वो तो दरअसल एक नाटक था, जिसे रामलाल के मूर्ख बेटे-बहुओं ने असली सेल समझकर इसकी खबर को आग की तरह फैला दिया।

अब मरते क्या ना करते! बैठ गए वहीं सब सेल का तमाशा देखने के लिये। नाटक शुरू होते ही पूरे मैदान में सन्नाटा हो गया। सभी तमाशे में लीन हो गए।

जब नाटक खत्म हुआ तो सबने चंदन और मधुर से सवाल शुरू कर दिये! मगर उन्होने बात को गांववालों पर ही डालते हुए कहा कि पर्ची सिर्फ उनके घर नहीं, बल्कि पूरे गांव में बंटी होगी। तो सबकी गलती ये थी कि किसी ने अपना दिमाग न लगाते हुए उनकी बात पर भरोसा क्यों किया! खैर, सब जानते थे कि इन दोनों के साथ बहस करना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना है! जाने दो! सब घर जाने लगे तो पता चला कि वह लोग जो सेल के भुलावे से खर्चने के लिये पैसा लेकर आये थे, सारा का सारा चोरी हो गया था। पूरे मैदान में खलबली मच गयी। सबने अपने इस नुक्सान का ज़िम्मेवार मधुर और चन्दन को बताते हुए उन्हें पीटना शुरू कर दिया। इतने में वहाँ पर पुलिस आ गयी, "ये सब क्या हो रहा है?"

गांववालों ने सारी बात हवलदार को बता दी।


"ह्म! तो ये है सारा खेल। अब तो इन दोनों को पकड़ना ही पड़ेगा। चलो थाने!"

"मगर हवलदार साहब, मैने कुछ नहीं किया! सेल की झूठी खबर तो इस मधुर ने फैलाई थी और सब बेवकूफ बन गए। "

चंदन ने अपनी सफाई देने की कोशिश की तो मधुर भला कैसे पीछे रहता!
"नहीं हवलदार साहब, मैने कुछ नहीं किया, मैं तो बस अपनी घरवाली से बात कर रहा था और इसने मेरी बात सुनकर पूरे गांव में ये हल्ला मचा दिया कि गांव में सेल लगने वाली है। अब आप ही बताईये, अपनी घरवाली से बात करना भी कोई अपराध है क्या!"

"मधुर, झूठ मत बोल! तूने भी तो सबको इस झांसे में फंसाया था की गांव में सेल लगने वाली है।"

"...अरे!!! बस करो अब! मेरा सर फटा जा रहा है तुम दोनों की बहस से! चलो, तुम दोनों को ही जेल में बंद कर देता हूँ!"

हवलदार घसीटता हुआ दोनों भाइयों को थाने ले गया और जेल में डाल दिया। दोनों की पत्नियाँ रोते रोते अपने ससुर के पास गयीं और उन्हे सारी बात बता दी।

रामलाल को अपने बेटों की इस करतूत पर बहुत गुस्सा आया। मगर घर कि इज़्ज़त बचाने के लिये उन्हे जेल से छुड़वाना आवश्यक था। उन्हे छुड़वाने के लिये पुलिस स्टेशन पहुंचा। थाने पहुंचकर वहां का नज़ारा देखकर वह दंग रह गया। चंदन और मधुर, जो एक दूसरे की बात को सदैव काटते थे, इस समय एक दूसरे के गले लगकर ज़ोर ज़ोर से रो रहे थे। रामलाल को यह सब बहुत अच्छा लगा। उन्हे ऐसा अनोखा दृश्य अपने जीवन काल में पहली बार देखने को मिला था।

उनकी आँखें खुशी से भर आईं। उन्होने जाकर हवलदार से अपने बेटों की इस करतूत के लिये माफी मांगी और उन्हें ज़मानत पर छोड़ देने की बिनती की।

हवलदार ने चुपचाप जाकर जेल का द्वार खोल दिया, चंदन और मधुर दोनों बाहर आये और अपने पिता से माफी मांगते हुये फूट-फूट कर रोने लगे। परंतु रामलाल ने अपने हृदय को थोड़ा कठोर बनाते हुये दोनों से कहा, "भले ही कानून ने तुम्हे माफी दे दी हो, मगर मेरे लिये तुम आज भी वही नकारा-निकम्मे कपूत हो जिन्होने गांव भर में मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी है। मैं तुम्हें केवल एक ही शर्त पर माफ कर सकता हूँ।"

"क्या बाबूजी??" दोनों ने एक ही स्वर में पूछा।
"यही कि तुम दोनों को मिलकर सारे गांव का हर्ज़ाना चुकाना होगा। और वो भी अपनी कमाई से। भले ही इसके लिये तुम्हे अपना बाकि का सारा जीवन मेहनत करनी पड़े, मगर जब तक ऐसा नहीं होगा, मेरे घर में तुम दोनों के लिये कोई जगह नहीं होगी।

"नहीं बाबूजी, ऐसा मत कहिये आप! हम आपसे वादा करते हैं की हमारे कारण जो आपको कष्ट हुआ है, उसका हर्ज़ाना हम ज़रूर भरेंगे। "

रामलाल अपने बेटों को इसी शर्त पर घर ले आया। दोनों बेटों में मिट्टी के खिलौने बनाने की अद्भुत कला थी। सो, दोनों ने मिलकर अपनी इस कला को अपना काम बना लिया और इसी ज़रिये दोनों मिलकर खूब पैसे कमाने लगे।


दो वर्ष बीत गये। चंदन और मधुर ने खूब पैसा कमा लिया था। और अब, चारों मिल-जुलकर रहने लगे थे। रामलाल के कहने पर दोनों ने सारा पैसा बेंक में जमा करना शुरू कर दिया और हर्ज़ाने को चुकाने के लिये पैसा इकट्‌ठा करने लगे। पुलिस कि मदद से उन्होने उन बदमाशों को भी पकडवा लिया था जिन्होने नाटक के दौरान सबके पैसे चोरी किये थे। उन्हे सज़ा तो दिलवा दी गयी परंतु वो चोरी के पैसे उनके पास नहीं मिले।

कुछ दिनों के बाद उन चारों को रामलाल ने जब असली कहानी बताई, तो वे अपनी ही मूर्खता और भूल पर हंस पड़े। दरअसल, यह सारा खेल रामलाल का रचाया हुआ था। सोने की इस सेल की कहानी के रचनाकार वही थे, जिन्होने सारे गांववालों, नाटक वालों, पुलिस और नकली चोरों की मदद से अपने दोनों बेटों और बहुओं को सीधा करने की योजना बनाई और इस कार्य में सफल होकर दिखाया।


-aa21

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Submitted by: aa21
Submitted on: Mon Sep 29 2014 15:39:02 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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रफा दफा -A.Kumar

posted Sep 25, 2014, 4:55 AM by A Billion Stories

आशीष एटीएम से पैसे निकाल ही रहा था की एक होशियार ने उसको चालाकी से दूसरी तरफ घूमा दिया और जब तक आशीष उसको देख पाता वो उसके दस हज़ार रुपए लेकर बाहर की तरफ निकल गया। बस एक गलती वो कर गया की एटीएम मशीन से पर्ची नहीं ले पाया। और उसी पर्ची के बाहर आते आशीष को मालूम पड़ा की उसके रुपए कोई दूसरा निकाल गया।

वो घबराया हुआ बहार आया तो देखा वो बदमाश कार में बस बैठ कर निकलने ही वाला था। 18 साल के आशीष ने दौर लगा दी और कार के सीसे को तोड़ते हुए उस बदमाश की गर्दन पकड़ ली। गाडी के साथ वो रोड पर घिसट गया पर गाडी छोटी थी आल्टो जैसी कोई गंभीर चोट नहीं आई। पर हाथ में सीसे घुस गए थे। फिर चलती गाडी से ही उसने गाडी की चाभी निकाल ली। अब तो वो बदमाश जिसका नाम आसिफ था, उसने घबराकर उसको पैसे वापस करने चाहे। पर देर हो चुकी थी। आसिफ घिर चूका था। भीड़ ने उसकी ठीक से मरम्मत की और उसको पुलिस के हवाले कर दिया गया।

आशीष ने बहादुरी का काम किया था पर फिर भी थाने में उसके रुपए जमा हो गए और अपना इलाज उसको खुद कराना पड़ा। दो दिन तक कोई FIR दर्ज नहीं हुई और वो थाने के चक्कर काटता रहा। आसिफ बिना कोर्ट में पेश हुए 48 घंटे से ज्यादा हवालात में रह लिया। शायद पुलिस कुछ लेन देन करके मामला ख़त्म कर देना चाहती थी।

इधर आशीष को कॉलेज की फीस भरनी थी - वो थाने के चक्कर अलग लगा रहा था। आखिर लेन देन वाला मामला भी सेट नहीं हुआ। राजीनामा में मन चाही रकम का मामला सही नहीं बैठा और तब तक प्रेस वाले को भी खबर हो गयी।

आखिर FIR तीसरे दिन दर्ज हुई और फिर पेपर में खबर छपी जो इस प्रकार थी - 'एटीएम में लोगों को मदद करने के नाम पर पैसे उड़ा ले जानेवाले को पुलिस ने दो किलोमीटर दौरा कर पकड़ा। ' न बंदी प्रतिक्षीकरण के तहत न आसिफ को समय पर कोर्ट मिला और न आशीष को समय पर उसके रूपए।
पुलिस भी क्या करे। संख्या है नहीं और काम ज्यादा। एक एक पुलिस वाले को रोज 20 -20 घंटे तक काम करना पड़ता है और वो भी सीमित वेतन में। अब रफा दफा ना हो तो क्या हो।

-A.Kumar

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Submitted by: A.Kumar
Submitted on: Thu Sep 18 2014 12:36:13 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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सड़क (छाप) नेता -A.Kumar

posted Sep 25, 2014, 4:55 AM by A Billion Stories   [ updated Sep 25, 2014, 8:28 AM ]

वो पटना साइंस कॉलेज से बारहवीं पास करने के बाद आई.आई. टी दिल्ली से डिग्री लेकर नौकरी करने आये अपने स्टेट में एक पथ निर्माण विभाग के इंजीनियर के तौर पर। वो चाहते तो विदेश में जाकर अच्छा दाम कमा सकते थे पर बिहार के नए मुख्यमंत्री के भासन सुनने के बाद उनका अपने प्रदेश के लिए कुछ करने का जज्बा पक्का हो गया था।

पर काम करते हुए महीना नही हुआ की वो समझ गए की बिहार की सड़क कभी सुधर नही सकती क्योँकि ये तो सड़क निर्माण बिभाग के नेता जी के कमाई से सीधा जुड़ा हुआ मामला था।

मुख्यमंत्री के पास शिकायत की चिट्ठी लिखी। पर वो चिट्ठी फिर अग्रेसित की गयी पथ निर्माण मंत्री के पास। यानि खुद के खिलाफ जांच का जिम्मा खुद मंत्री जी को ही सौंपा गया। अब तो मंत्री जी का आग बबूला होना स्वभाविक था।

मंत्री जी ने तुरंत इंजीनियर के खिलाफ जाँच शुरू की तो पता चला की इंजीनियर साहब की डिग्री तो न ही AICTE और न ही UGC से मान्यता प्राप्त है। बस मंत्री जी ने बर्खास्तगी का फरमान जारी कर दिया।

अब खबर तो बननी ही थी। बवेला मचा जब मंत्री जी के खिलाफ तो वो पुराने औकात पर आये। यानी गुंडा गर्दी पर और इंजीनियर साहब को मरवाकर रेल की पटरी पर फेंकवा दिया। खूब जांच हुई और आज भी जांच चल रही है। और आज भी हर साल सड़क बनती है मंत्री जी से लेकर सभी नेता खूब कमाई करते हैं।

-A.Kumar

Submitted by: A.Kumar
Submitted on: Wed Sep 03 2014 12:53:59 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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बुआ के फूल -Sumitdis

posted Feb 2, 2014, 6:55 AM by A Billion Stories   [ updated Feb 2, 2014, 7:01 AM ]

कल बुआ का श्राद्ध विधि-विधान से सम्पन्न हो गया, लगभग सभी लोग चले गए, अंश आज सुबह ही गया था, सलोनी का एक पेपर बाकी था तो उसे लेकर जाना पड़ा। कल कांता भाभी और फूफाजी भी चले जायेंगे, प्रियांश धीरज की सहायता के लिए रुक गया है।


२० - २५ दिनों से, जब से बुआ की तबियत बिगड़ने लगी थी धीरज को सांस लेने की भी फुर्सत नहीं थी, वह छुट्टी लेकर लगातार बुआ के साथ रह रहा था, डॉक्टर को दिखाने या अस्पताल ले जाने की पूरे गाँव के जिद के आगे भी बुआ नहीं झुकी थी,''नहीं ! मुझे कहीं नहीं जाना है, मरना है तो यहीं मरूँगी अपने कुल देवता की शरण में ! मेरा बेटा भरी जवानी में चला गया, मुझे क्यों बुढ़ापे में जिंदा रखना चाहते हो?''

"मैं तो सच्चे अर्थों में बेटे के साथ उसी दिन मर गई थी, उसकी कुछ जिम्मेदारियाँ थी, जिन्हें मैंने अपनी सामर्थ्य से पूरा कर दिया है, जो नहीं कर पाई उसे ईश्वर सम्भालेंगे !'' बुआ ने एक तरह से इच्छा-मृत्यु का वरण किया था।

उस रात धीरज उनके सिरहाने बैठा ऊंघ रहा था, उन्हें साँस लेने में बहुत तकलीफ हो रही थी, उन्होंने धीरे से धीरज का हाथ दबाया, धीरज ने चौंक कर पूछा- बुआ पानी चाहिए?

"उस अलमारी को खोल कर मेरी डायरी दे !"

धीरज ने डायरी निकाल कर उन्हें थमा दी बुआ ने एक कागज निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाया-

"क्या है?"

बुआ ने धीरे से कहा- पढ़ ले, मेरे मरने के बाद अपने फूफा को दे देना !

धीरज उसे मोड़ कर रखने लगा तो बुआ धीरे से बोली- 'पढ़ ले और जैसा लिखा है, वैसे ही करना !

धीरज पढ़ने लगा। बिना किसी संबोधन के चंद पंक्तियाँ थी- मैं जा रही हूँ, आप आज़ाद तो पहले भी थे, फिर भी मेरे कारण समाज में जो एक बंधन था, उससे भी मैं आपको मुक्त करती हूँ, आपके दिए शूल को मेरा जीवित शरीर तो झेल गया पर मेरे मृत शरीर को छूकर मेरी आत्मा को दूषित मत कीजियेगा, मेरे श्राद्ध का पूरा कर्म मेरे पोते करेंगे। इन तेरह दिनों में उन लोगों की देखभाल धीरज और उसकी पत्नी करेंगे। आपकी बहू को भी उन लोगों से दूर ही रखियेगा क्योंकि मैं इतने दिन सूक्ष्म शरीर से उन लोगों के साथ रहूँगी और आप लोगों का स्पर्श मुझे दूसरे लोक में भी मुक्ति नहीं देगा।

धीरज की आँखे भर आई थी, वो विवशता से बुआ की तरफ देखने लगा।

बुआ ने कराहते हुए कहा- तू क्यों रोता है? तूने तो अपना कर्तव्य पूरा निभाया, पूरी जिंदगी में कभी कुछ पुण्य ज़रूर किये थे जिससे तुम मिले। मेरे पोते तुम्हारे हवाले हैं, उन्हें सही राह दिखाना। उन लोगों को फोन कर दो, मुंबई से आने में भी तो समय लगेगा।

धीरज फोन करने हॉल में गया और लौट कर आया तब तक बुआ अपनी अनंत यात्रा पर निकल चुकी थी। धीरज की पत्नी बगल वाले कमरे में सो रही थी, उसे बुला कर उसने शव को भूमि पर उतारा, घड़ी देखी, 6 बज रहे थे, ठण्ड की सुबह थी, धूप अभी निकली नहीं थी, उसने फूफा को फोन कर दिया, अभी तक नाम मात्र को निभते चले आ रहे रिश्ते का अंत तो उन्हें बताना ही था।

दो घंटे के भीतर वे लोग आ भी गए, गाँव वालों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी।

धीरज ने एकांत में बुआ का पत्र लिफाफे के आवरण से ढक कर फूफा को पकड़ा दिया, उनके चेहरे की प्रतिक्रिया देखने के लिए भी वह वहाँ नहीं रुका। पत्र देने के बाद से धीरज महसूस कर रहा था कि फूफाजी उसे देख कर आँखें चुरा लेते थे। जिस घटना को वे अब तक तीन ही लोगों तक सीमित मान कर वे सहज थे, आज चौथे को उसका साक्षी जान कर असहज हो गए थे। धीरज भी उनके सामने जाने की कम से कम कोशिश करता।

धीरज को उड़ती-उड़ती खबर मिली थी कि भाभी अब मायके में ही रहती हैं, फूफाजी अकेले ही रहते थे, किसी भी असामान्य सम्बन्ध की आयु क्षीण ही होती है उन लोगों की नजदीकियों ने कितनों को उनसे दूर किया था, अब शायद उन्हें समझ में आ रहा होगा। बुआ ने तो उन्हें सदा के लिए दूर कर ही दिया था। अंश और प्रियांश भी उनके करीब नहीं आ पाए, वे दोनों बस औपचारिकतावश उनके पास जाते थे।

दूसरे दिन बुआ दोनों पोतों और भतीजों के कन्धों पर चढ़ कर शान से विदा हो गई। अंश तो कुछ शांत था, प्रियांश का रो रो कर बुरा हाल था। धीरज के मना करने के बावजूद अंश सलोनी को लेकर आया था- नहीं चाचा, दादी उसे बहू मान चुकी थी और बहू को सास के अंतिम दर्शन तो करना ही चाहिए। गाँव में भी सबको उसका परिचय मेरी होने वाली पत्नी के रूप में ही दीजिएगा।

धीरज के पिता बुआ के चचेरे भाई थे, उनकी आकस्मिक मौत से धीरज का पूरा परिवार संकट में पड़ गया था, गाँव की नाम मात्र की खेती से किसी तरह खाने लायक निकल पाता था, धीरज दसवीं में था और उसका छोटा भाई सातवीं में ! ऐसे समय में बुआ इन दोनों भाइयों को अपने साथ ले आई, बुआ का गाँव शहर के पास ही था, धीरज बी एड करके बुआ के गाँव के ही स्कूल में अध्यापक हो गया था और तभी से बुआ के दूसरे बेटे का फ़र्ज़ निभा रहा था। छोटा भाई भी डिप्लोमा करके नौकरी करने लगा था। संजीव भइया धीरज से पाँच महीने बड़े थे, जब तक संजीव भईया स्कूल में थे तब तक बुआ फूफाजी के साथ सिंगरोली में ही रहती थी। संजीव भईया का पी एच यू के एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हो गया, बुआ को घर का सूनापन काटता।

फूफाजी अपनी सिविल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ कर बिल्डर बन गए थे, पूरे शहर में कई हाऊसिंग सोसाइटियों का कंस्ट्रक्शन उन्होंने ही करवाया था। अच्छी खासी कमाई थी। फूफाजी अपनी व्यस्त दिन चर्या के कारण बुआ को समय नहीं दे पाते, गाँव में भी बहुत संपत्ति थी इसलिए बुआ धीरे धीरे गाँव में ही आकर बस गई, संजीव भईया इंटर्नशिप कर रहे थे। बुआ उनसे कहती ''शादी कर ले '' लेकिन बिना पीजी किये वे शादी के लिए तैयार नहीं थे। बुआ उन्हें समझाती "तू पीजी करना, बहू कुछ दिन मेरे पास रहेगी।"

एक बार फूफाजी के एक सहयोगी के यहाँ संजीव भईया ने कांता भाभी को देखा और मुग्ध हो गए। कांता भाभी के पिता शहर के नामी ठेकेदार थे। भईया का पीजी के बाद शादी का फ़ैसला बदल गया और उनकी शादी हो गई।

शादी के बाद भाभी अक्सर भईया के पास होस्टल चली जाती या भईया को सिंगरोली बुला लेती। भाभी ने दो साल में दो पोते देकर बुआ को निहाल कर दिया था।

भैय्या इस बार खूब मेहनत कर रहे थे सबको उम्मीद थी की उनका सिलेक्शन हो जायेगा लेकिन भाग्य में तो कुछ और ही लिखा था, उनकी मोटर साईकल का ऐसा जबरदस्त एक्सीडेंट हुआ कि उन्होंने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया। पूरा परिवार दुःख के इस भीषण प्रहार से टूट गया कोई किसी को सहारा देने लायक नहीं था। धीरज और उसकी पत्नी ही किसी तरह सबको संभाल रहे थे। बुआ सूनी आँखों से बस दूर कहीं देखती रहती। दोनों पोतों को देख कर ही उनकी आँखों में थोड़ी चमक आती।

फूफाजी जब शहर जाने लगे तो बुआ से कहा- कांता को कोई नौकरी कर लेनी चाहिए, घर मैं बैठ कर इतनी बड़ी जिंदगी कैसे गुजरेगी।

बुआ बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ केवल सुन लेती। एक साल के बाद कांता भाभी ने शहर के एक प्रायवेट स्कूल में नौकरी कर ली। बुआ कुछ दिन दोनों बच्चों को लेकर उनके साथ रही, फिर उन्होंने तय किया कि जब तक दोनों बच्चे स्कूल जाने लायक होते हैं, उन्हें वे अपने साथ गाँव में रखेंगी, बीच-बीच में भाभी आ जाया करेंगी। वैसे भी बच्चों के प्रति भाभी को मोह न पहले था न अब !

बुआ बच्चों को घर में प्रारंभिक शिक्षा के साथ उत्तम संस्कार भी दे रही थी, दोनों का नामकरण भी बुआ ने ही किया था- अंश और प्रियांश ! 'मेरे संजीव के अंश और प्रियांश है ये दोनों'

जब उनके स्कूल जाने का समय आया भाभी को उनकी देखभाल में परेशानी होने लगी तो हार कर उन्हें सिंगरोली में ही होस्टल में डालना पड़ा। धीरज महीने में 2-3 बार उन बच्चों को दादी के हाथ का बना ढेर सारा खाने का सामान पहुँचाता। धीरज को भाभी के स्वाभाव पर आश्चर्य होता, इन्सान जिससे प्रेम करता है उसकी निशानी से तो उससे भी अधिक प्रेम करना चाहिए। पता नहीं भाभी को भईया से प्रेम था या केवल दैहिक सुख की कामना से ही वे उनका साथ चाहती थी।

इधर फूफाजी की भी हरकतें उसे अजीब सी लगती वे भाभी की छोटी से छोटी ज़रूरतों का भी ख्याल रखते, उन्हें स्कूल छोड़ना, घर ले आना, सब फूफाजी की ही ज़िम्मेदारी थी। कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, वे सब काम छोड़ कर भाभी का काम करते। बुआ के प्रति फूफाजी की लापरवाही को वह उनकी आदत समझता था लेकिन बुढ़ापे में व्यक्ति की आदतें क्या इतनी अधिक बदल सकती हैं?

एक बार जब गाँव में उसकी पत्नी ने कहा था- कांता भाभी जब नहा रही थी, तब बाथरूम में गीज़र खराब हो जाने पर फूफाजी उन्हें गर्म पानी भर कर दे रहे थे।

तब धीरज ने उसे बेकार की बात कह कर टाल दिया था लेकिन उसे यह देख कर बुरा लगता कि महिलाओं की ज़रूरत की नितांत निजी चीजें भी फूफाजी ही भाभी को लाकर देते !

फिर भी वह मन को समझाता कि शायद बेटे को खो देने के बाद वह भाभी से हमदर्दी में ही उनका ख्याल रखते हैं।

धीरे धीरे समय बीतता गया, अंश का दसवीं का बोर्ड था, बुआ अब ज्यादा शहर नहीं जा पाती थी, बच्चों से मिले बहुत दिन हो गए थे, एक दिन उन्होंने धीरज को बुला कर कहा- कल रविवार है, मुझे ज़रा बच्चों से मिला ला ! बहु से भी बहुत दिनों से नहीं मिल पाई हूँ, अपने फूफाजी को फोन करके बता देना कि मैं आ रही हूँ।

उस दिन एस टी डी फेल थी और इतनी छोटी सी बात के लिए धीरज ने खबर करना ज़रूरी नहीं समझा।

वे लोग 5 बजे वाली बस से चले और 7 बजते बजते पहुँच भी गए। धीरज ने दरवाजे की घण्टी दबा दी, काफी देर बाद फूफाजी दूध का पतीला लिए बाहर आए। उन्होंने समझा शायद दूध वाला आया है, उन लोगों को देख कर वे चौंक गए, उनके चेहरे का रंग बदल गया। बिना इस बात पर ध्यान दिए बुआ मुस्कराती हुई सामान लिए सीधे अपने बेडरूम में चली गई। फूफाजी छत पर चले गए थे। तब तक दूध वाला आ गया और धीरज दूध लेने लगा। अचानक बुआ बदहवास सी बाहर आ गईं, उनका चेहरा बिल्कुल सफ़ेद पड़ गया था, धीरज उनका चेहरा देख कर डर गया। बचपन मैं बरफ के गोले को एक ही जगह से चूस-चूस कर जैसे वह सफ़ेद कर देता था वैसा ही चेहरा बुआ का हो गया था।

भाभी को नहीं आता देख धीरज तीन कप चाय बना लाया। तब तक बुआ बाहर से अन्दर आती हुई बोली- बच्चों को जल्दी ले आ।

और पूजा घर में घुस गई।

धीरज अकेला ही चाय पीने लगा। तभी उसने भाभी को बुआ के कमरे से निकलते देखा, वे चुपचाप बाथरूम में घुस गई थीं। न समझते हुए भी धीरज को बहुत कुछ समझ में आ गया।

वह कौन सी बात थी जिसने फूफाजी और बुआ दोनों के चेहरे का रंग बदल दिया, इसका अनुमान धीरज को भी हो गया। वह जल्दी जल्दी चाय खत्म करके बच्चों को लाने के लिए निकल गया। घर के दम घोंटू वातावरण से वह भी घबरा गया था।

बच्चे घर में घुसते ही दादी को ढूंढने लगे। दोनों को देखते ही बुआ उन्हें गले लगा कर चीत्कार कर उठी। ऐसा करूण रुदन तो उन्होंने भैय्या की मौत पर भी नहीं किया था।

बच्चे भी नहीं समझ पा रहे थे कि दादी इतना क्यों रो रही हैं। बच्चे दो ही घंटे के लिए आये थे, बुआ ने उन्हें पढ़ाई सम्बन्धी ज़रूरी हिदायतें दी और साथ लाये खाने का सामान उन्हें सौंप कर उन्हें विदा कर दिया। धीरज बच्चों को पहुँचा कर लौटा तब तक बुआ भी चलने को तैयार बैठी थी।

धीरज ने कहा भी- बुआ, बस शाम को है।

लेकिन बुआ ने शांत स्वर में जवाब दिया- चलो स्टैंड पर ही बैठेंगे, यहाँ दम घुट रहा है।

घर लौटने तक रात हो गई। धीरज ने तो बीच में दो बार चाय पी ली थी, लेकिन बुआ ने सुबह से एक घूंट पानी तक नहीं पिया था। उन्होंने रात को धीरज को अपने पास ही रोक लिया, खाना बनाया उसे परोस कर पास ही बैठ गई। उनका शांत और गंभीर स्वर धीरज सुन रहा था- आज तूने जो कुछ भी देखा या समझा, उसे केवल अपने तक ही सीमित रखना। मेरी तो कोख और मांग दोनों ही उजड़ गए। अगर वे किसी वेश्या को भी घर में लाकर रख लेते तो भी मुझे इतना कष्ट नहीं होता। बहू किसी के साथ भाग जाती या दूसरी शादी कर लेती, मैं बर्दाश्त कर लेती। दोनों ने सम्बन्ध की पवित्रता को ही कलंकित कर दिया। मेरे साथ की गई बेवफाई के लिए मैं उन्हें माफ़ कर भी देती, लेकिन मेरे बेटे के साथ उन्होंने धोखा किया, इसके लिए मैं उन्हें सौ जन्मों तक माफ़ नहीं करुँगी। चुप मैं केवल इसलिए रही या रहूँगी, क्यूंकि समाज में अगर उनकी इज्ज़त पर कीचड़ उछलेगा तो उसके छींटे मेरे अंश और प्रियांश की पवित्र जिंदगी को भी मलिन कर देंगे।

उस दिन के बाद से बुआ की तपस्या शुरू हुई। उन्होंने अपनी चूड़ियाँ उतार दी, बिंदी और सिंदूर लगाना बंद कर दिया। अपने गहनों के तीन भाग कर एक धीरज की पत्नी को दे दिया, दो भाग अंश और प्रियांश के नाम खोले अलग अलग लोकरों में डाल दिए। तन ढकने के लिए दो-तीन सादी और शरीर बचाने के लिए दो समय का खाना उनकी ज़रूरत था। अंश और प्रियांश जब परीक्षा के बाद आये, तब बनारस ले जाकर उनका जनेऊ कर आई। अंश का रिज़ल्ट अच्छा आया जिस साल उसने बारहवीं की परीक्षा दी, उसी साल उसका चयन मुंबई के एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। प्रियांश भी पहले ही साल मेडिकल में आ गया। छुट्टियों में दोनों भाई अपने माँ या दादाजी के पास जाते तो ज़रूर थे लेकिन श्रद्धा और प्यार सिर्फ दादी से ही था...

इस बार दुर्गा पूजा की छुट्टियों में धीरज बुआ को दिल्ली छोड़ आया, वहाँ अंश किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में आया हुआ था, प्रियांश की भी तीन-चार दिन की छुट्टी थी, वह भी आ गया।

बुआ उन्हें लेकर वैष्णो देवी गई थी, वहाँ से लौट कर वे बहुत खुश नज़र आ रही थी। एक दिन धीरज को बुला कर उन्होंने एक फोटो दिखाते हुए कहा- देख ले तेरी होने वाली बहू है, अंश के साथ ही पढ़ती है, दिल्ली में उससे मिल चुकी हूँ, उसे भी वैष्णोदेवी ले गई थी। देवी के सामने दोनों को एक दूसरे का हाथ थमा कर मैं निश्चिन्त हो गई हूँ। बहुत सुन्दर, समझदार और सुलझी हुई लड़की है। शादी तो दोनों पढ़ाई खत्म करके ही करेंगे, उतना इंतज़ार यह शरीर नहीं कर पायेगा। अब बोरिया-बिस्तर समेटने का समय आ गया है। जिंदगी के लिए मंसूबे बनाते तो लोगों को बहुत देखा और सुना है, बुआ तो मौत की तैयारी में व्यस्त थी। ऐसा लगता था कि यमदूत उनके खरीदे गए गुलाम की तरह खड़े हों।

धीरज कल शाम से ही बेसुध सोया था, प्रियांश की बात से उसकी नींद खुली- चाचा उठिए, दादा और माँ भी चले गए। आज तो दादी के फ़ूल संगम में विसर्जित करने के लिए निकलना है ना !

सो लेने से धीरज की थकावट सचमुच कम हो गई थी। वह इलाहबाद जाने के लिए तैयार होने लगा। उसे संगम में उन कंटीली यादों को भी विसर्जित करना था, जिनके शूल से छलनी हो कर उसकी प्यारी बुआ इन फूलों में परिणित हुई थी।



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Photo by: Pradeep Sahoo
Submitted by: Sumitdis
Submitted on: Thu Jan 30 2014 20:10:01 GMT+0530 (IST)
Category: Fiction-An Imaginary Story
Language: हिन्दी/Hindi



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खरगोश और हथी (पञ्च्तन्त्र की कथाएঁ) -देवसुत

posted Jan 29, 2014, 11:17 AM by A Billion Stories

एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था। झुंड के सरदार को गजराज कहते थे। वो विशालकाय, लम्बी सूंड तथा लम्बे मोटे दांतों वाला था। खंभे के समान उसके मोटे-मोटे पैर थे। जब वो चिंघाड़ता था तो सारा वन गूंज उठता था।

गजराज अपने झुंड के हाथियों से बड़ा प्यार करता था। स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था और सारे के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे।

एक बार बारिश न होने के कारण वन में अकाल पड़ा। नदियां, सरोवर सूख गए, वृक्ष और लताएं भी सूख गईं। पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी वन को छोड़कर भाग खड़े हुए। गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे। वे भी भोजन और पानी न मिलने से तड़प-तड़पकर मरने लगे। झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ। वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बचें।

एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, 'इस वन में न तो भोजन है, न पानी है! तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो।'

हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया। हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटक गए। एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, 'यहां से कुछ दूर पर एक दूसरा वन है। वहां पानी की बहुत बड़ी झील है। वन के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं।' गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने हाथियों से कहा कि अब हमें देर न करके तुरंत उसी वन में पहुंच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों हैं। गजराज अन्य हाथियों के साथ दुसरे वन में चला गया।

उस वन में खरगोशों की एक बस्ती थी। हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने के लिए जाया करते थे। हाथी जब खरगोशों की बस्ती से निकलने लगते, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे। कुछ खरगोश मर जाते थे, कुछ घायल हो जाते थे।

रोज-रोज खरगोशों को मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में हलचल मच गई। खरगोश सोचने लगे, यदि हाथियों के पैरों से वे इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जाएगा।

अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई। सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए। खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, 'क्या हममें से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करा सके ?'

सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, 'यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाए, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूं। 'सरदार ने खरगोश की बात मान ली और खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया।

खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा। वह हाथियों के बीच में खड़ा था। खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे। अगर वह हाथियों के बीच में घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दे। यह सोचकर वह पास ही की एक ऊंची चट्टान पर चढ़ गया। चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारकर कहा, 'गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं। चंद्रमा से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं।'

चद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ। उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, 'क्या कहा तुमने? तुम चद्रमा के दूत हो? तुम चंद्रमा से मेरे लिए क्या संदेश लाए हो?'

खरगोश बोला, 'हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं। चंद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है। सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है। तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं। चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं। चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम सावधान हो जाओ। नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे हाथियों को मार डालेंगे।'

खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत हो उठा। उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत और उसकी बात को सचमुच चंद्रमा का संदेश समझ लिया उसने डर कर कहा, 'यह तो बड़ा बुरा संदेश है। तुम मुझे तुरंत चंद्रमा के पास ले चलो। मैं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करूंगा।'

खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा, 'मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले चल सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे।' गजराज ने खरगोश की बात मान ली।

पूर्णिमा की रात थी। खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया। उसने गजराज से कहा, 'गजराज, मिलो चंद्रमा से ' खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया। पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाईं को ही चंद्रमा मान लिया।

गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी। पानी में लहरें पैदा हो उठीं, परछाईं अदृश्य हो गई। गजराज बोल उठा, 'दूत, चंद्रमा कहां चले गए ?'

खरगोश ने उत्तर दिया, 'चंद्रमा तुमसे नाराज हैं। तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है । तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते।'

गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली । उसने डर कर कहा, 'क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्न हो सकते हैं?'

खरगोश बोला 'हां, है। तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। तुम कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहां से दूर चले जाओ। चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जाएंगे।' गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया। वह दूसरे दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया।

इस तरह खरगोश की चालाकी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया और उसने अपनी बुद्धिमानी के बल से खरगोशों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया।

-Stories from the Panchatantra

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Photo by:
Submitted by: देवसुत
Submitted on: Wed Jan 29 2014 22:52:19 GMT+0530 (IST)
Category: Ancient Wisdom
Language: हिन्दी/Hindi



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सब के सब चोर हैं -imrankhan

posted Jan 22, 2013, 9:35 AM by A Billion Stories


सूरमा जी हमारे पडोसी हैं। एक दिन उन्होंने हमें चाय पर बुलाया। सूरमा जी एक प्राइवेट फर्म में लिपिक के पद पर थे, लेकिन घर उन्होंने बड़ा अच्छा सजा रखा था। दो दो एयर कंडीशनर , गीजर ; वाह जी वाह! बातों ही बातों में राजनीती की चर्चा शुरू हुई, अरविन्द केजरीवाल और मुकेश अम्बानी का ज़िक्र आया। सूरमा जी बोले "सब के सब चोर हैं, मुकेश अम्बानी को देख लो , देश को नुकसान पहुंचाता है, जिसे हम देश का गौरव समझते थे वो ही चोर निकला।" मैंने भी पनीर खाते हुए अपनी सहमति जताई।

खाने के बाद चाय का सिलसिला शुरू हुआ, मैंने चाय की चुस्की के साथ शर्मा जी से पुछा "सूरमा जी ये तो बताइए दो दो एयर कंडीशनर का खर्चा कैसे उठाते हैं"|

सूरमा जी बड़े गर्व के साथ बोले "वो जी कुछ नहीं डॉक्टर साहब! बस शाम होते ही मीटर पर मैगनेट रख देते है, इलेक्ट्रॉनिक मीटर खुद-ब-खुद बंद हो जाता है।"

मेरी चाय ख़तम हो चुकी थी और मैं शर्मा जी के इन वचनों को सोचता हुआ उठा " सब के सब चोर हैं"|
-imrankhan

Submitted on: Sat Jan 19 2013 01:52:18 GMT-0800 (PST)
Category: Original
Language: Hindi
Copyright: A Billion Stories (http://www.abillionstories.com)
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