शाम सुंदरी -Shashank 'Ravi'

posted Nov 28, 2013, 7:36 AM by A Billion Stories
शाम सुंदरी

मन सुन्दर औ' तन से सुंदरी
सेज बिछो फूलों की
के शाम सुंदरी आई है.
तन मटमैला, मन उजियाला,
वोह नर्म लालिमा लायी है.

है रंग सांवली बाला सा,
जैसे हो मिलन दो घड़ियों का.

एक घडी हो जिसमें धूप प्रखर,
संग किरणों के आताप बहे,
और एक घडी जो कोमलता से,
मध्यम-मध्यम राग कहे.

परिधान में ओढ़े है हर रंग,
नित पंछी इसका अलंकार,
हैं चहों दिशाओं से उड़ते,
करें गा-गाकर इसका सत्कार.

दिन के घटनाक्रम की नाभि में,
बसी हुई कस्तूरी सी,
जिस प्रेम-मधु को प्रियजन तरसें,
वह मदिरा ले आई है.
एक शाम सुंदरी आई है.

पथिक के तन की पीड़ा हरती,
कवि हृदय को व्याकुल करती,
इधर-उधर इठलाती चलती,
स्वयं रति अंगडाई है,
एक शाम सुंदरी आई है.

- शशांक
-Shashank 'Ravi'
 


Photo by:
Submitted by: Shashank 'Ravi'
Submitted on: Sat Nov 23 2013 09:23:06 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi



- Read submissions at http://abillionstories.wordpress.com
- Submit a poem, quote, proverb, story, mantra, folklore, article, painting, cartoon, drawing, article in your own language at http://www.abillionstories.com/submit

Comments