धिक्कारे हुये एक पथिक की अनकही महत्ता -Pri Sun Feb 10 2013 17:58:14 GMT-0800 (PST)

posted Feb 10, 2013, 5:58 PM by A Billion Stories
वो अकेला चला,
चलता रहा।
उसे न कुछ पाना था ,
न कुछ खोने को था रखा ।
अप्नत्व्य की तलाश में ,
बढ़ता चला , चलता गया।

चमकने की जो वो आस थी ,
तो चांदनी बन सकी वो ईद की ।
ईद की चाँद को तो सब तरसे ,
सबने टकटकी लगाये इंतज़ार किया ।
पर उसकी चांदनी की क्या बिसात ?
उसने भूमि के किसी कोने को न रोशन किया ,
न बधू की शोभा सजा सका ।

पोष की भोर की उस वर्षा सी ,
गिरता रहा ...
जमीन को उसकी जरुरत नहीं ,
न मांगता था उसे आसमान ।
उसे स्वयं में समां कर ,
इक पंखुड़ी खिलती रही।
और वो बस अतिवृस्टि सी गिरता रहा।
-Pri

Submitted on: Sun Feb 10 2013 09:05:34 GMT-0800 (PST)
Category: Original
Language: Hindi
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