मैंने पीछे मुड़ जब देखा -हरेकृष्ण आचार्य

posted Dec 13, 2014, 6:00 AM by A Billion Stories
मैंने पीछे मुड़ जब देखा
धुंद में ओझल होती सड़क के पीछे
दो बत्ती,
तेज़ चलती गाड़ी की शायद ,
सोचने के पल ही में ,
दो पहियों के बीच के बम्पर पर सर ,
टकराकर,
पहियों के नीचे, शरीर के टूटने की आवाज़ ,
को सुनकर जब दर्द नहीं हुआ ,
तो मालूम हुआ कि अब ज़िंदा ,
न ही बचूंगा,
शायद ! की उम्मीद फिर भी !
खून से लथपथ कुचले कपड़ों
का गीलापन नहीं महसूस हुआ,
तो लगा, अब तो नहीं बचूंगा ,
शायद ! की उम्मीद फिर भी !
जब न दिखा, न सुना ,
और लगा कि बस एक और पल है सांस ,
तब मैं बोला , नहीं, … सोचा ,
हे राम ।

-हरेकृष्ण आचार्य

-हरेकृष्ण आचार्य

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Submitted by: हरेकृष्ण आचार्य
Submitted on: Fri Dec 12 2014 16:54:49 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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