Hindi Poems

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Hindi Poems

  • सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है -बिस्मिल अज़ीमाबादी सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैदेखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में हैकरता नह ...
    Posted Sep 13, 2016, 6:37 AM by A Billion Stories
  • तुम्हारा टेलीफून -देवसुत प्यार की बातें बोलकर मुझे बहलाओ मत ,अभी बोलो तुम आओगे कब ?बच्चे रोते हैं, पर पूछते नहीं ह ...
    Posted Sep 4, 2016, 9:05 PM by A Billion Stories
  • सड़क, जोकर - हिंदी बाल कविताएँ -देवसुत सड़क------सड़क बनी है लंबी चौड़ी उसमे जाती मोटर दौड़ी सब बच्चे पटरी पर जाओ बीच सड़क कभी न जाओ ज ...
    Posted Sep 4, 2016, 9:02 PM by A Billion Stories
  • ह्रदय का क्रंदन -Amar ह्रदय का क्रंदन या प्रिये का वंदनया करूँ शंखनादअंजुली भर भर अनादर मैं पी चूकाजहर ...
    Posted Mar 19, 2016, 8:31 AM by A Billion Stories
  • शहर - Part 1 -हरेकृष्ण आचार्य क्यों हैं यह रास्ते संकरे ?क्यों हैं यहाँ बाबू अंधे ?क्यों हैं यहाँ लोग प्यासे मरते ?जब बाँध ...
    Posted Mar 19, 2016, 8:29 AM by A Billion Stories
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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है -बिस्मिल अज़ीमाबादी

posted Sep 13, 2016, 6:37 AM by A Billion Stories

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है

खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,

हाथ जिन में हो जुनूँ कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
-------
Editors Note: This work is popularly attributed to Ram Prasad Bismil though he was not the author.

-

Photo by:
Submitted by: बिस्मिल अज़ीमाबादी
Submitted on:
Category: Folklore
Language: हिन्दी/Hindi


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तुम्हारा टेलीफून -देवसुत

posted Sep 4, 2016, 9:05 PM by A Billion Stories

प्यार की बातें बोलकर मुझे बहलाओ मत ,
अभी बोलो तुम आओगे कब ?
बच्चे रोते हैं, पर पूछते नहीं हैं तुमको ,
हँसकर मैं भी जवाब नहीं देती उनको ।
तुम्हारे पैसों से खाना बनता है, ख़ुशी नहीं ,
बिन बाप के बच्चे, बढ़ेंगे कैसे? पता नहीं !
मुझे पैसों की भरमार नहीं , ख़ुशी चाहिए ,
तुम्हारा हाथ, तुम्हारा साथ चाहिए ।
पैसे अब काफी हैं ज़िन्दगी काटने के लिए ,
बच्चों की देख-रेख और पढ़ाई के लिए ।
बाकी जो बचा, वह कुछ कर लेंगे इधर-उधर ,
अभी बोलो, तुम आओगे कब ?

-देवसुत

Photo by:
Submitted by: देवसुत
Submitted on: Mon Sep 05 2016 00:00:00 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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सड़क, जोकर - हिंदी बाल कविताएँ -देवसुत

posted Sep 4, 2016, 9:02 PM by A Billion Stories

सड़क
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सड़क बनी है लंबी चौड़ी
उसमे जाती मोटर दौड़ी
सब बच्चे पटरी पर जाओ
बीच सड़क कभी न जाओ
जाओगे तो दब जाओगे
चोट लगेगी पछताओगे

जोकर
---------
सरकस में है आता जोकर ,
सबका दिल बहलाता है ।
सिर पर लम्बा टोप पहनकर ,
नकली नाक लगता है ।
रंग बिरंगा चेहरा करके,
हँसता और हँसाता है |

-

Photo by:
Submitted by: देवसुत
Submitted on: Mon Aug 01 2016 22:03:54 GMT+0530 (IST)
Category: Story-Folklore
Language: हिन्दी/Hindi


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ह्रदय का क्रंदन -Amar

posted Mar 19, 2016, 8:31 AM by A Billion Stories

ह्रदय का क्रंदन या प्रिये का वंदन
या करूँ शंखनाद
अंजुली भर भर अनादर मैं पी चूका
जहर तेज था मैं जी चूका

प्रिये अब तो समझ जाओ
अप्रिय बोल से जी ना जलाओ
मैं जो जला तो तुम्हे क्या सुख दे पाउँगा ?
अंदर के अनल में जल अंदर राख बन जाऊंगा

जो जल जायेगा मन
तन का मोल ना रह जायेगा
तन दिखेगा सुन्दर बस एक
खोल ही तो रह जाएगा

हम नही मिले लड़ने के लिए
अभी तो तवा पर आरजू भी ना हुई
पास रहकर प्रेम की की एक ग़ुफ़्तगू ना हुई

कभी आओ प्रिये अपनी मर्जी से
साथ रहकर देखो की इन झगड़ों में
कितना रस है ,क्योँ दूर हो
खुदगर्जी से।

-Amar

Photo by: -
Submitted by: Amar
Submitted on: Wed Feb 17 2016 13:55:48 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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शहर - Part 1 -हरेकृष्ण आचार्य

posted Mar 19, 2016, 8:29 AM by A Billion Stories

क्यों हैं यह रास्ते संकरे ?
क्यों हैं यहाँ बाबू अंधे ?
क्यों हैं यहाँ लोग प्यासे मरते ?
जब बाँध हैं पानी से फूटते ?

कहते हैं शहर में पानी कम है
पर फिर गगन-चुम्भी बनाते क्यों हैं ?
ढक देते हैं क्यों ज़मीं को सीमेंट से?
तालाबों को क्यों भर देते ?

पानी कम नहीं स्वार्थ ज़्यादा है
तालाब से ज़्यादा ज़मीन में फायदा है
फ्लैट बनाएंगे और पानी बेचेंगे
और हम?
फ्लैट में रहेंगे और प्यास से मरेंगे ।

-हरेकृष्ण आचार्य
Penned: 15-6-2010

-हरेकृष्ण आचार्य

Photo by:
Submitted by: हरेकृष्ण आचार्य
Submitted on: Sat Mar 05 2016 09:02:50 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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मैं तन्हा प्रिये जागा सारी रात -Amar

posted Mar 19, 2016, 8:28 AM by A Billion Stories

मैं तन्हा प्रिये जागा सारी रात
कभी इस करवट कभी उस करवट
बिस्तर पर पड़ती रही अकेलेपन की सलवट
हीर हिर्दय सुलगता रहा
अकेलेपन का नस्तर चुभता रहा
याद तेरी सताती रही पल पल
आँखों से झरना बहा कई बार कलकल

दुःख बड़ा है ये बिरह का
पत्नी होकर भी बिना किसी कारन दूर रहती हो
ये वजह है कलह का

मेरे प्रेम में सम्पूर्णता नही थी
या शादी के मन्त्रों में रही कमी
कारन कुछ भी हो पर प्रिये
मैं आज भी जागा सारी रात
कभी इस करवट कभी उस करवट




-Amar

Photo by:
Submitted by: Amar
Submitted on: Wed Feb 17 2016 11:17:11 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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क्योँ बढ़ गयी धन की प्यास -Amar

posted Mar 6, 2016, 6:24 AM by A Billion Stories

हमें कितना प्रेम दिया जब हम छोटे थे
तब नही थी आपको मुझसे आस
आज क्योँ बदल गए आप
क्योँ बढ़ गयी धन की प्यास

क्या रिश्तों का आँगन ऐसे ही सिमटेगा
अपनों का दामन बस धन में लिपटेगा
क्योँ नही रहा आपको अपनेपन का एहसास
क्योँ बढ़ गयी धन की प्यास

क्या धन के लिए मैं कहीं डाका डालूं
कोई घोटाला कर डालूं
अपने को बेच खुद नई नजर में बना डालूं अपना उपहास
क्योँ बढ़ गयी धन की प्यास

धन से ख़ुशी नही मिलती अप्पा
संतोष बड़ा धन है
सबसे बड़ा धन है आस
क्योँ बढ़ गयी धन की प्यास

-Amar

Photo by:
Submitted by: Amar
Submitted on: Wed Feb 17 2016 10:59:34 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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क्या मैं आपको जानता हूँ ? -हरेकृष्ण आचार्य

posted Dec 29, 2015, 5:11 AM by A Billion Stories

क्या मैं आपको जानता हूँ ?

मैंने आपको कहीँ देखा है ।

एक बार नहीं कई बार,
शायद …

लेकिन आप ने मुझे अभी तक नहीं देखा ,
देखते भी तो मुझे पहचानते नहीं
शायद …

एक बार एक मोड़ पे ,
मैं खड़ा इंतज़ार कर रहा था जब ,
एक तेज़ ट्रक में बैठे आप ,
मेरे पास से निकले थे ।

मुझे याद है ,
आप ही थे ,
शायद …

कई बरस बाद फिर ,
एक बरसाती रात में ,
बिजली के खम्बे के पास,
से गुज़रा था मैं जब,
आप खड़े थे बिन भीगे ।

मुझे याद है ,
आप ही थे ,
शायद …

अभी बस कुछ दिनों पहले फिर,
मुझे स्ट्रेचर पर डॉक्टर ले जा रहे थे जब,
आपरेशन थिएटर में बैठे थे आप ।

मुझे याद है ,
आप ही थे ,
शायद …

मेरी यादें अब धुंधली ,
आँखों की रौशनी बुझती ,
बे-आवाज़ कमरे में,
आप अब मुझसे मिलने आए हैं ?

क्या मैं आपको जानता हूँ ?

-हरेकृष्ण आचार्य

Photo by:
Submitted by: हरेकृष्ण आचार्य
Submitted on: Fri Sep 18 2015 22:02:53 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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मैंने कब पीछे मुड़ देखा ? -हरेकृष्ण आचार्य 01.02.2015 16:58:28

posted Feb 1, 2015, 3:28 AM by A Billion Stories   [ updated Feb 1, 2015, 3:54 AM ]

मैं भारत

कई आये तूफ़ान , कई बवंडर ,
कई आए बाढ़ , कई भूचाल ,
कितने मरे, कितने बचे,
कितने गिरे, कितने उठे,
कितने गए, कितने आए ,
पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ?

कई आये राम, कई रावण,
कई आये बुद्ध , कई चंगेज़,
कितने मिले, कितने बिछड़े ,
कितने हँसे , कितने रोए ,
कितने ज़िंदा, कितने मुर्दा,
पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ?

कहीं पूजा, कहीं जिहाद,
कहीं यज्ञ, कहीं आतंक,
कितने सुखी, कितने दुखी,
कितने शांत, कितने आतंकी,
कितने सत्य, कितने भ्रम,
पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ?

कहीं प्यार , कहीं बम ,
कहीं जश्न, कहीं सर कलम,
कितने राजा, कितनी प्रजा,
कितने राज्य, कितनी परंपरा ,
कितने राष्ट्र , कितनी जनता ,
पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ?

कितने किले, कितने दरबार,
कितने चोर, कितने मक्कार,
कितने बस बैठे-बैठे आग,

कितने मंत्री, कितने तंत्री ,
कितने वीर, कितने वीरगति,
कितने बस देखते - देखते बलि ,

कितने अशोक, कितने अकबर,
कितने अंग्रेज़ , कितने औरंगज़ेब ,
कितनो ने किया यहाँ हेर - फेर ,
पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ?

पर मैंने पीछे मुड़ कब देखा ।

-हरेकृष्ण आचार्य
21:15, 19/07/2006

First penned in the English Script as below. Lost and found after 8 years thanks to Marisha's page in Geocities (http://www.geocities.ws/hansteraho/literary/kris_mudke.htm) and indexed by Google.
I always wanted to write it in Hindi Script. Thanks to A Billion Stories to make it so simple. And Marisha's comment below on the poem:

- another beautiful composition in hindi about the paths tread by the indomitable spirit of India....from Krishna after a long hiatus. - Marisha


main BHAARAT.

kai aaye toofaan, kai bawandar,
kai aaye baadh, kai bhoochaal,
kitne mare, kitne bache,
kitne gire, kitne uthe,
kitne gaye, kitne aaye,
par maine peeche mud kab dekha?

kai aaye raam, kai raavan,
kai aaye buddh, kai changez,
kitne mile, kitne bichde,
kitne hasse, kitne roye,
kitne zinda, kitne murda,
par maine peeche mud kab dekha?

kahin pooja, kahin jihad,
kahin yagya, kahin aatank,
kitne sukhi, kitne dukhi,
kitne shaant, kitne aatanki,
kitne satya, kitne bhram,
par maine peeche mud kab dekha?

kahin pyar, kahin bum,
kahin jashn, kahin sar kalam,
kitne raja, kitni praja,
kitne rajya, kitni parampara,
kitne rashtra, kitni janata,
par maine peeche mud kab dekha?

kitne kile, kitne darbaar,
kitne chor, kitne makkaar,
kitne bas baithe-baithe aaag,

kitne mantri, kitne tantri,
kitne veer, kitne veergati,
kitne bas dekhte-dekhte bali,

kitne ashok, kitne akbar,
kitne angrez, kitne aurangzeb,
kitno ne kiya yahaan her-pher.
par maine peeche mud kab dekha?

MAINE PEECHE MUD KAB DEKHA?

-B. H. Acharya
21:15, 19/07/2006



-हरेकृष्ण आचार्य

Photo by:
Submitted by: हरेकृष्ण आचार्य
Submitted on: Sat Dec 13 2014 20:39:32 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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आस -Aashirwad

posted Jan 22, 2015, 11:17 AM by A Billion Stories

कुछ ख्वाब अधूरे से
कोई प्यास अधूरी सी
इन आँखों में क्यूँ हैं
एक आस अधूरी सी

राह पर जमी रही ये नज़रें
इंतज़ार की इन्तहा होने को आई
फिर भी ना माने मन बावरा
तकता रहा किसी के दीदार मे
ख्वाइश थी मुकम्मल जहाँ बसाने की
रिश्तो के बाज़ार मे

दिन थे वो सुहानी थी रातें भी खुशनुमा
थे हज़ारों परवाने रोशन मोहब्बत के नाम पर
मेरे दिल का मिजाज़ भी था आशिकाना
कम्बख़त था मेरा और धड़कता था किसी और के नाम से
इश्क के सफ़र में हमसफ़र दिलनशी था
दिलबर की अदाओं का आलम हसीं था

फिर शाम घिर आई हैं
फिर यादों का वो घेरा हैं
तेरे निशाँ की तलाश में
खोया चैन-ओ-सुकून मेरा हैं

इस शब् के सियाह साये में
खामोशी हैं, वीरानी हैं
तेरे बिना अधूरी, बिन तेरे अनकही
कुछ ऐसी मेरी कहानी हैं |

-Aashirwad

Photo by:
Submitted by: Aashirwad
Submitted on: Mon Feb 17 2014 00:18:27 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi


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